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महामारी ने खोलें नए आयाम, दिए परिवार को पुनः साथ आने के अवसर



सरवन शर्मा की विशेष रिपोर्ट 

प्रयागराज,15 दिसम्बर 20 - वैश्विक महामारी कोविड-19 प्रबलतम क्षमता के साथ अभूतपूर्व चुनौती बनकर आ खड़ी है। इसने दुनिया को हतप्रभ कर चिकित्सा जगत के पुरोधाओं के होश उड़ा दिये हैं। संसार के सर्वाधिक धनाढ्य एवं संसाधन संपन्न देशों ने भी इसके आगे अपने घुटने टेक दिये। लेकिन एक ऐसा देश भी है जिसनें अपनी सकारात्मक सोच व सांस्कृतिक क्रिया-कलापों के बल पर इस महामारी की चुनौतियों का डटकर सामना कर रहा है। जिसका उदाहरण यह भी है की वैश्विक महामारी के दौर में भारत सबसे कम मृत्यु दर वाला देश बन गया है। 

       कोविड-19 महामारी ने हमे दुख देने के साथ बहुत कुछ ऐसा दिया जिसके विषय मे हमने कभी सोचा नहीं था। जिसने भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों की जीवन शैली को पुनर्स्थापित किया जो विस्मृति के गर्त मे चले गये थे। "स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क रहता है”, इस मंत्र से हम उदासीन हो चले थे। महामारी से लड़ने के लिये प्रतिरोधक क्षमता की अनिवार्यता और उपयोगिता को हमने समझा जिसे अंग्रेजी दवाओं के आगे हम भूल गए थे। युद्ध करने के लिए सर्वप्रथम जैसे सैनिक का स्वस्थ रहना परमावश्यक है वैसे ही महामारी रूपी शत्रु को हराने के लिये शरीर मे रोग प्रतिरोधक क्षमता का पुष्ट होना अत्यंत आवश्यक है। 

आज भारत के घर-घर में नर-नारी ,बच्चों और बुजुर्गों मे योग क्रिया के प्रति अनुराग की लहर जीवंत हो गई है। हम ऋणी हैं इस महामारी के जिसने हमें नींद से जगाया है। स्वस्थ रहने के लिए योग चेतना आज भारत मे ही नहीं अपितु विश्वव्यापी हो गई है। इस चेतना की अलख जगाने के साथ भारत ने विश्व को इस ज्ञान के आगे नतमस्तक कर दिया। हमने स्वच्छता को अपनी ढाल बनाया गंदगी हर महामारी की जननी है। इस सोच का प्रचार व प्रसार किया गया। मुंह मे मास्क लगाना, बार-बार हाथ धोना, और दो गज की दूरी बनाये रखना, जैसे निर्देशों और क्रियाओं के मूल में संक्रमण से बचने के लिये स्वच्छता को ही सर्वोपरी आधार बनाया गया। 

      कोविड-19 महामारी की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धि हमेँ परिवारों के समेकित होने के अवसरों की उपलब्धता के रूप मे दृष्टिगत हुई। परिवार के बिखरे हुये सदस्यों को लॉकडाउन के दिनों मे एक साथ रहने का स्वर्णिम अवसर मिला। बच्चों को माता-पिता दोनों की एक साथ उपस्थिति में जीवन को जीने का सुखद अनुभव प्राप्त हुआ। मौलिक चिन्तन और नवाचारों को मूर्तरुप देने का भरपूर अवसर मिला ।

      लॉकडाउन मे बाज़ार, होटल-ढाबे, दुकाने आदि बन्द किये जाने का तात्कालिक आदेश मन को दुखद अवश्य लगा किन्तु बाहर खाने के सारे स्रोतों के स्थगित हो जाने पर घर की रसोई स्वच्छ, शुद्ध, स्वादिष्ट और स्वास्थ वर्धक पकवानो से महक उठी। मां और पत्नी के हाथों से पके भोजन ने खाने की मिठास बढ़ा दी। पिज्जा-बर्गर जैसे खाने पर विराम लगा। बच्चों की खाने पीने की आदतों मे सुधार हुआ है।

        यह भी ज्ञात हो कि जहां कोविड-19 ने बहुत से कार्यों मे अवरोध उत्पन्न किया वहीं कार्य करने की नवीन प्रणालियों को प्रशस्त किया। ऑनलाइन कार्यक्रमों का विशाल द्वार खुल गया। लॉकडाउन के कारण महीनों तमाम कार्य ठप्प रहे ऐसे मे आनलाइन शैक्षिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था के डिजिटलीकरण के प्रारूप ने जन्म लिया। सर्वसाधारण को भी इसकी उपयोगिता का ज्ञान हुआ। डिस्टेंट शिक्षा सुद्धण हुई। ऑनलाइन कार्यप्रणाली का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार हुआ व कम समय मे अधिक कार्य निस्तारण एवं संचरण की कला का प्रादुर्भाव हुआ। 

      कोविड के दुखों को झेलते समय हमे अपने डाक्टर्स ,नर्स और सेवा कर्मियों की सेवा परायणता, निस्वार्थ सेवा, कर्तव्य परायणता और समर्पण भाव का अभूतपूर्व रुप देखने और उनकी महानता को समझने का अवसर मिला। जिन्होंने जीवन की बाजी लगाकर रोगियों का उपचार दवाओं से नहीं बल्कि स्नेह, करुणा और मानवीय संवेदनाओं से किया। जाति, धर्म, पंथ सम्प्रदाय से बढ़कर ' सर्व धर्म सम्भाव ' का अनोखा उदाहरण साक्षात देखने को मिला व 'वसुधैव कुटुम्बकम' का संदेश विश्व को देने वाले भारत की आत्मा को पहचानने का अवसर मिला।

      कोविड-19 महामारी को झेलने वाले संपूर्ण विश्व ने भारत को अपना सर्वश्रेष्ठ मित्र, साथी और संवेदनशील सहायक के रूप मे पाकर सराहा। अभावों से ग्रस्त होने पर भी भारत ने दूसरे देशों की यथासंभव मदद करके अपने ऋषि-मुनियों, दधीचि और कर्ण जैसे दानवीरों की परंपराओ का निर्वाह किया। इस महामारी में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी की यशस्वी छवि को वैश्विक पटल पर सर्वाधिक तेजस्वी नक्षत्र की ऊंचाइयां प्राप्त हुई इससे भारत को अभूतपूर्व गौरव मिला।